What is Holi

होली क्या है और कैसे मानते है ? What is Holi ?

नमस्कार दोस्तों आज के इस लेख में हम बात करने वाले है। होली क्या है और कैसे मानते है ? What is Holi ? तो लास्ट तक जरूर पढ़े यहाँ से आपको एक अच्छा ज्ञान प्राप्त होगा।

आखिर बडे इंतजार के बाद, आ ही गया वो समय जिसका सबको इंतेजार रहता है आ गया है वो समय जब आसमान और धरती अपने चमकीले रंगो की चादर औढ लेते है । धरती का कोना कोना सज जाता है संवर जाता है पेड पौधे नइ नवेली पत्तियो से खुद को ढक लेते है । आखिर आ ही गया सबसे रंगीले त्योहार का समय , लो आ ही गया होली का समय 

होली जिसे फाग/धुलंडी/रंग वाली होली ना जाने कितने ही नाम से जाना जाता है , भारत के हर कोने मे इसे पूरे शबाब के साथ मनाया जाता है पर देश का एक ऐसा भाग, देश का एक वो हिस्सा जो ना जाने कितने ही समय से इस त्योहार का सिरमोर रहा है वो है उत्तर प्रदेश का बिरज भूभाग। इस भूभाग कि मिटटी मे आज भी कान्हा ऐसे बसे हुए है कि जैसे कभी यहाँ से गये ही नही। कान्हा के जीवन की हर छोटी बडी लीला को ये भूभाग ऐसे समेटे है जैसे की एक मा अपने बच्चे को।

बिरज के गांवो और शहरो मे आज भी जिंदा है , वही होली जो कान्हा और राधा खेला करते थे आज भी वही सब दोहराया जाता है वैसे ही जैसे कभी द्वापर मे हुआ होगा।

तो अपनी जेबो मे रंग और गुलाल भर लिजिये, और तैयार हो जाइये एक ऐसी रंग भरी यात्रा करने के लिये जो आपको रंगो से सरोबार कर देंगी केवल आपके शरीर को ही नही बल्कि आपकी आत्मा को भी

What is Holi ?

What is Holi
What is Holi

जहाँ देश के बाकी सारे हिस्से मे होली एक दिन या दो दीन या ज्यादा से ज्यादा तीन दीन की होती है, यहा की होली महीने भर चलती है। रंग पंचमी या वसंत पंचमी वो पहला दिन होता है जबसे यहा होली शुरु हो जाती है और होली के 2 -3 दिन तक रहती है। इस भुभाग की होली हर साल ना जाने कितने ही लोगो को देश और दुनिया के कोने कोने से खींच कर अपने पास ले आती है 

पर होली के मुख्य कार्यक्रम जिन्मे शामिल होने के लिये सब लोग आते है उनकी शुरुआत होती है लड्डू होली से, 

लड्डू होली :- 

मुख्य होली से कुछ 9 दिन पहले (10 मार्च ) को बरसाना (राधा रानी कि जन्म भुमि) से राधादासी सखी होली का निमंत्रण देने गुरुवार सुबह नंदगांव (कान्हा का निज स्थान)  की और जाती है वो निमंत्रन खाली हाथ नही लेकर जाति बल्कि अपने साथ  एक हांडी मे गुलाल भरकर और साथ में  प्रसाद और पान का बीड़ा ले कर जाती है फिर इस गुलाल को नंदगांव के घर-घर में वितरण किया जाता है । नंदभवन में इस सखी का भव्य स्वागत सत्कार किया जाता है और फिर इस होली निमंत्रण को स्वीकार कर लिए जाने की जानकारी देने के लिये नंदभवन का एक पंडित शाम को बरसाना पहुंचता है  वह राधा जी के निज महल में यह संदेश देता है कि कल नंदगाव से होली खेलने को लोग आएंगे । ये सब बाते वो बडे उत्साह के साथ बताता है और अपने साथ लाए लड्डुओ को श्रद्धालु पर बरसाता है । ये सब घटनाए बडे रोचक तरीके से किया जाता है । अद्भुत गायन और ढोलक और तबलो के बीच पांडा का नृत्य और लड्डुओं की बरसात का अद्भुत दृश्य देखते ही बनता है

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लट्ठमार होली

भगवान कृष्ण की साथी राधा के जन्म स्थान बरसाना की लट्ठमार होली भारत की सबसे खुब्सूरत, अद्भुत और मजेदार होली है होली मनाने के अपने अनूठे तरीके के लिए पूरी दुनिया मे मशहुर है । हाल मे ही एक फिल्म मे भी इस अद्बभुत होली का चित्र्ण किया गया है बरसाने की लट्ठमार होली फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की नवमी यानी लडडू होली (11 मार्च ) के अगले दिन मनाई जाती है।

बरसाना की ये लठामार होली भगवान कृष्ण के काल में उनके द्वारा की जाने वाली लीलाओं को दोहराने जैसा है । ऐसा माना जाता है कि कृष्ण अपने मजाकिया स्वभाव के साथ अपने दोस्तो  के साथ हाथो मे गुलाल लिये राधारानी तथा उनकी सखियों के साथ होली खेलने पहुंच जाते थे तथा उनके साथ मजाक करते थे जिस पर राधारानी और उनकी सहेलिया ग्वाल वालों पर डंडे बरसाया करती थीं। ऐसे में लाठी-डंडों की मार से बचने के लिए कान्हा और ग्वाले ढ़ालों का प्रयोग किया करते थे 

 इस धारना को आज भी नंदगाव और बरसान के रहने वाले लोग बडे ही मन से निभाते है आज भी बहुत सुबह दिन नंदगाँव के ग्वाल बाल होली खेलने के लिए राधा रानी के गाँव बरसाने जाते हैं और उसके बाद पारम्परिक  पूजा अर्चना के बाद नंदगांव के पुरुष भी होली खेलने के लिये बरसाना गांव में आते हैं इन पुरूषों को होरियारे कहा जाता है।

जब नाचते झूमते नंदगांव के लोग बरसाना पहुंचते हैं तो औरतें हाथ में ली हुई लाठियों से उन्हें पीटना शुरू कर देती हैं और पुरुष खुद को बचाते भागते हैं। पर ये सब हंसी मजाक की तरह ही लिया जाता है और एक बहुत ही रंगीन और हंसी खुशी का  वातावरण होता है। दर्शक रंगीली गली जहाँ ये सब चल रहा होता है उसे रंगो से सरोबार कर देते है । हवा मे तरह तरह के गुलाल और रंगीन पानी की पिचाकारिया एक अजब सा समा बना देती है । 

इस होली को देखने के लिए बड़ी संख्या में देश-विदेश से लोग बरसाना आते है  

 

नंदगाव की होली 

बरसाना की लट्ठमार होली के बाद अगले दिन यानी फाल्गुन शुक्ला दशमी के दिन (12 मार्च ) बरसाना के हुरियार नंदगांव की हुरियारिनों से होली खेलने उनके यहां पहुंचते हैं। तब नंदभवन में होली की खूब धूम मचती है। वही सब रस्मे फिर से निभाइ जाती है बस अबकी बार लोग और जगह बदल जाती है। 

 

रंग भरी एकादशी

दुनिया भर मे मशहुर बांके बिहारी मंदिर मे होली कि शुरुआत रंग भरी एकादशी से ही होती है । इस तिथी से व्रंदावन के बांके बिहारी मन्दिर मे पूजित बांके बिहारी सफेद रंग के कपडो को धारण करते है और उनके हाथ मे चांदी और सोने की पिचकारिया सजाइ जाती है । सबसे पहले मंदिर के सेवायत बांके बिहारी के सफेद कपडो से ढके शरीर पर अबीर और टेसू के फुलो से बने हुए गुलाल को बिखरकर होली का शुभारमभ करते है और उसके बाद पूरे वृंदावन मे होली का शबाब बिखर जाता है । 

कान्हा को यहा एक छोटे से बचचे की तरह समझा जाता है और उन्हे कचोरी, जलेबी और पेडे का भोग लगाया जाता है  

What is Holi  : हम उम्मीद करते है की आपको हमारा यह पोस्ट होली क्या है और कैसे मानते है ? What is Holi ? जरूर पसंद आया होगा।

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